पचोला (ग्रामीण), राजस्थान: भारत के ग्रामीण इलाकों में, जहां अक्सर शहरों से दूरी और आधुनिक माध्यमों की पहुंच की कमी की वजह से अवसर सीमित हो जाते हैं, वहां निशा कंवर नरुका बदलाव की शांत लेकिन शक्तिशाली लहर बनकर उभरी हैं। उनकी कहानी सिर्फ बैंकिंग से जुड़ी नहीं है। यह स्वायत्तता और गरिमा की कहानी है, जिसमें गांव में रुकने का फैसला स्थायी बदलाव को प्रेरित करता है।
राजस्थान विश्वविद्यालय से कला में स्नातक, 22 साल की निशा, पचोला गांव की रहने वाली हैं, जहां औपचारिक बैंकिंग सेवाएं अभी भी कम हैं और सबसे नज़दीकी शाखा जाने के लिए भी लोगों को एक दिन का सफर करना पड़ता है। अनगिनत युवतियों तरह उनके पास भी काम की तलाश में अपना गांव छोड़ने का विकल्प था। इसके बजाय, उन्होंने इस साधारण से विश्वास से प्रेरित होकर, वहीं रहने का फैसला किया कि ‘प्रगति उन लोगों तक पहुंचनी चाहिए जहां वे रहते हैं।‘
निशा, आज, एक सामुदायिक बैंकर के रूप में काम करती हैं, जो महत्वपूर्ण वित्तीय सेवाएं को सीधे अपने गांव और आस-पास की बस्तियों में पहुंचाती हैं। आधार संबद्ध भुगतान प्रणाली से जुड़ी सेवाओं के ज़रिये, वह गांव वालों को बगैर दूर-दराज़ गए, या बिचौलियों पर निर्भर हुए बिना पैसे निकालने, खाते का बैलेंस पता करने आदि में मदद करती हैं। बुजुर्गों, महिलाओं, किसानों और दिहाड़ी मजदूरों के लिए, यह पहुंच सुविधाजनक ही नहीं, बल्कि यह उन्हें सशक्त बनाती है।
निशा लेन-देन के अलावा, यह सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं कि सरकारी सब्सिडी और कल्याणकारी लाभ लाभार्थियों तक पहुंचें। पेंशन और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं से लेकर शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा के लिए सहायता तक, वह परिवारों को उन प्रणालियों को समझने में मदद करती हैं जो दूर की कौड़ी और डरावनी लगती थीं। इस तरह, वह औपचारिक वित्त व्यवस्था में विश्वास बहाल करती हैं और अंतिम-मील आपूर्ति का विस्तार करती हैं।
निशा अपने गांव में साधारण से माहौल में काम करते हुए जानी-पहचानी और भरोसेमंद चेहरा बन गई हैं। उनकी उपस्थिति ने वित्तीय व्यवस्था में समावेश बढ़ाया है, जागरूकता बढ़ाई है, और अपेक्षाकृत अधिक महिलाओं को आत्मविश्वास से बैंकिंग सेवाओं से जुड़ने के लिए प्रोत्साहित किया है। वह न केवल वित्तीय पहुंच बढ़ा रही हैं बल्कि वह ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं के नेतृत्व वाली सेवा और नेतृत्व को सामान्य बना रही हैं।
निशा ने लगभग ₹20,000 प्रति माह कमाकर, अपने समुदाय को ऊपर उठाते हुए अपने लिए स्थायी आजीविका अर्जित की। उनके सफर से स्पष्ट है कि ग्रामीण उद्यमिता यदि उद्देश्य से जुड़ जाए, तो आर्थिक स्वतंत्रता और सामाजिक बदलाव दोनों संभव हैं।
उन्होंने अपना गांव नहीं छोड़ा बल्कि उसी जगह को सशक्त बनाने का फैसला किया।
पत्रिका जगत Positive Journalism