जयपुर 16 जनवरी 2026आज का युग डिजिटल क्रांति का युग है। मोबाइल फोन, सोशल मीडिया, डिजिटल ऐप्स और इंटरनेट ने मानव जीवन को अत्यंत सरल और तेज़ बना दिया है। एक क्लिक में जानकारी, मनोरंजन, खरीदारी और संवाद संभव हो गया है। लेकिन इस सुविधा के साथ-साथ एक गंभीर समस्या भी सामने आ रही है—लोगों में बढ़ती अधीरता (Impatience)।
डिजिटल मीडिया और ऐप्स ने हमें तुरंत परिणाम पाने की आदत डाल दी है। पहले किसी पत्र के उत्तर के लिए दिनों या हफ्तों का इंतज़ार करना पड़ता था, आज कुछ सेकंड में मैसेज का जवाब न मिले तो बेचैनी होने लगती है। यही आदत धीरे-धीरे हमारे स्वभाव का हिस्सा बनती जा रही है।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म जैसे इंस्टाग्राम, फेसबुक और यूट्यूब पर लगातार बदलती रील्स और शॉर्ट वीडियो हमारे ध्यान को सीमित कर रही हैं। लोग लंबे समय तक किसी एक काम पर ध्यान केंद्रित नहीं कर पा रहे हैं। इससे न केवल धैर्य की कमी हो रही है, बल्कि मानसिक तनाव और चिड़चिड़ापन भी बढ़ रहा है।
डिजिटल ऐप्स ने जीवन को तेज़ तो बना दिया है, लेकिन रिश्तों में गहराई कम कर दी है। परिवार के साथ बैठकर बातचीत करने के बजाय लोग अपने फोन में व्यस्त रहते हैं। इससे सामाजिक संबंध कमजोर हो रहे हैं और अकेलेपन की भावना बढ़ रही है।
बच्चों और युवाओं पर इसका प्रभाव और भी गंभीर है। ऑनलाइन गेम्स और तुरंत मिलने वाले रिवॉर्ड्स ने उन्हें मेहनत और प्रतीक्षा से दूर कर दिया है। वे असफलता को सहन नहीं कर पाते और जल्दी निराश हो जाते हैं।
हालाँकि डिजिटल मीडिया पूरी तरह से नकारात्मक नहीं है। सही उपयोग से यह ज्ञान, करियर और रचनात्मकता को बढ़ावा दे सकता है। आवश्यकता है संतुलन की। हमें डिजिटल साधनों का उपयोग करना चाहिए, लेकिन उन पर निर्भर नहीं होना चाहिए।
अंततः, यह कहा जा सकता है कि डिजिटल मीडिया और ऐप्स ने हमारे जीवन को बदला है, परंतु यदि हम धैर्य, आत्मनियंत्रण और वास्तविक मानवीय संबंधों को महत्व दें, तो हम इस तकनीक को अपने जीवन के लिए वरदान बना सकते हैं, अभिशाप नहीं।
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