प्रसार तंत्र देश की रीढ़ है: डाॅ. शर्मा

Editor-Manish Mathur

जयपुर 08 फरवरी 2021  – महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर में राष्ट्ªीय खाद्य सुरक्षा मिशन योजना के तहत श्तिलहनी फसलों में उत्पादन व उत्पादकता बढ़ाने हेतु प्रौद्योगिकीश् पर दो दिवसीय प्रशिक्षण का आरंभ आज 08 फरवरी, 2021 को अनुसंधान निदेशालय में किया गया। इस प्रशिक्षण कार्यक्रम के प्रायोजक कृषि विभाग, राजस्थान सरकार है तथा इस में कृषि विभाग, उदयपुर जिले के 20 कृषि अधिकारी व कृषि पर्यवेक्षक भाग ले रहे हैं।
कार्यक्रम के उद्घाटन सत्र के मुख्य अतिथि डाॅ. एस. के. शर्मा, अनुसंधान निदेशक ने बताया कि तिलहनी फसलों के उत्पादन में अभी भी हमारा देश पिछड़ा हुआ है इसलिए हमें इनकी उत्पादन एवं उत्पादकता बढ़ाने पर ध्यान देना आवश्यक है जिससे की हमारा देश वनस्पति तेलों में आत्मनिर्भर बन सके। तिलहनी फसलों का उत्पादन क्षेत्र अभी 26 से 28 लाख हैक्टेयर है जिसे 32 लाख हैक्टेयर करना है। उन्होंने कहा कि कृषि अधिकारियों का एक मजबूत प्रसार तंत्र हमारे देश की रीढ़ की हड्डी है तथा तिलहन उत्पादन बढ़ाने के लिए हमें समय-समय पर फसलों के लिए सूक्ष्म पोषक तत्व प्रबंधन, समन्वित पोषक तत्व प्रबंधन एवं अन्तराशस्य क्रियाएं के महŸव संबंधित कार्यक्रम आयोजित करने होगें। साथ ही उन्होंने कहा कि तिलहनी फसलों में हमें जितना नत्रजन, सल्फर, जिंक, गोबर की खाद, कम्पोस्ट डालना चाहिए उतना नहीं डालते हंै जिससे मृदा में जैविक कार्बन का स्तर कम हो रहा है। इन पोषक तत्वों की कमी दूर करने के लिए मृदा परीक्षण करवाएँ तथा जैविक आदानों का प्रयोग करें।
प्रशिक्षण प्रभारी तथा क्षेत्रीय अनुसंधान निदेशक डाॅ. रेखा व्यास ने सभी अतिथियों व प्रतिभागियों का स्वागत किया और बताया कि तिलहनी फसलों के उत्पादन में भारम एक मुख्य देश है। हमारे देश की कृषि पारिस्थितिक स्थितियाँ 9 प्रमुख तिलहनी फसलों को उगाने के लिए अनुकूल है। इनमें से 7 खाद्य तेलों की है – तिल, मूंगफली, सरसों, सोयाबीन, सूरजमुखी, राया, नीगर व 2 अखाद्य तेलों की अलसी और अरंडी शामिल हैं। देश की तिलहन आवश्यकता को पूरा करने के लिए सरकार ने तिलहन फसलों के क्षेत्र को बढ़ाने का निर्णय लिया है। इनकी उत्पादन व उत्पादकता में वृद्वि करने से हम खाद्य तेलों के आयात को कम कर सकेगें। अभी हमारा देश 6 से 7 मिलियिन टन तेल आयात कर रहा है जो लगभग देश में हो रही खपत का 50 प्रतिशत है। हमें तिलहन फसलों की उत्पादकता से लाभ हेतु नवीन व उननत किस्मों का बीज उत्पादन कर कृषकों को वितरण करना होगा। साथ ही कम लागत की गुणवŸाायुक्त तकनीकें जिनके माध्यम से अधिक उत्पादन व अधिक लाभ प्राप्त हो को भी उपलबध करवानी होगी। इस क्षेत्र में कृषि उद्यमिता के अवसर भी युवाओं को उद्यमिता व रोजगार उपलब्ध करवाया जा सकता है।
सह-अनुसंधान निदेशक डाॅ. अरविन्द वर्मा ने कहा कि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन की शुरूआत सन् 2007 में हूई तत्पश्चात् इसकी योजनाएँ 7 से 8 घटकों में चल रही है और तिलहन मिशन की शुरूआत वर्ष 2014-15 में हुई जिससे हम तिलहनी फसलों में उत्पादन एवं उत्पादकता को बढ़ाने के प्रयास कर रहे हैं। साथ ही उन्होंने कहा कि हमें आत्मनिर्भरता की पूर्ति करने के लिए हमें अधिक से अधिक प्रयास करने होगंे और अपने ज्ञान को अनुसंधान एवं प्रसार के माध्यम से किसानों तक पहुंचाना है।
डाॅ. अभय दशोरा, सहायक आचार्य ने कार्यक्रम का संचालन किया तथा सभी आगन्तुओं का धन्यवाद डाॅ. बी. जी. छीपा, सहायक आचार्य ने ज्ञापित दिया एवं कार्यक्रम के संयोजन में डाॅ. गजानन्द जाट, सहायक आचार्य ने सहयोग किया।

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