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समाज के काले एवं डरावने सत्य को दर्शाता है और आशा की एक नई उम्मीद जगाता है ‘बड़की‘ उपन्यास

Editor-Dinesh Bhardwaj
जयपुर 12 अप्रैल 2021  – कुछ किताबें होती हैं जिन्हें पढ़कर लगता है कि वर्तमान दौर में भी हिंदी साहित्य में कुछ युवा बहुत अच्छा लिख रहें हैं। उन्हीं युवाओं में से एक राजस्थान मूल के युवा साहित्यकार करण निम्बार्क द्वारा लिखा उपन्यास ‘बड़की‘ इन दिनों पढ़ा गया सबसे सुंदर और बेहतरीन उपन्यास रहा।
‘बड़की‘ केवल एक उपन्यास नहीं बल्कि 1970 के समय के समाज का प्रतीक है जो आज भी हमारे मध्य जीवंत है। यह एक लड़की बड़की की मार्मिक किंतु प्रामाणिक कथा है, जो शिक्षा में अव्वल आती है और शहर जाकर आगे पढ़ना चाहती है। समाज इसके खिलाफ एक जंग छेड़ देता हैं। लेखक ने बड़की के संघर्षों को अत्यंत कलात्मक और व्यंग्यात्मक ढंग से प्रस्तुत किया है। यह बेहद विचारणीय है कि आजादी के सात दशक बाद भी समाज के यथार्थ की विरूपता में अब भी कोई कमी नहीं आई है। लेखक ने बड़की के माध्यम से समाज के इस काले और डरावने सत्य को दर्शाया हैं और आशा की एक नई उम्मीद जगाई है।
करण निम्बार्क ने अपने इस उपन्यास में हिंदी भाषा में अनूठे प्रयोग किये हैं, हिंदी के ऐसे शब्दों और मुहावरों से रूबरू करवाया हैं जिन्हें हम भूलते जा रहे थे। जैसे कहानी में एक दृश्य आता हैं जब बड़की अपने भाई परशुराम से कहती हैंः भाई पता हैं मैं पूरे मंडल में प्रथम आयी हूँ और मास्टर जी कह रहे थे कि मुझे शहर जा कर आगे की पढ़ाई करनी चाहिए। इसी दृश्य में अचानक पास से गुजरती मोटरसाईकिल से काला सा द्रव्य परशुराम के मुंह पर जा लगता है और वह कहता है ‘कर दिया मुंह काला‘। मुहावरे के माध्यम से लेखक दर्शाना चाहता है कि गाँव के किसी भी मनुष्य के लिए गाँव की लड़की का पढ़ना मुंह पर कालिख पोत लेने जैसे होता हैं।
इसी तरह के बहुत से व्यंग एवं मुहावरों का प्रयोग करते हुए लेखक ने उपन्यास को और भी खूबसूरत बनाया है। करण निम्बार्क द्वारा  ईमानदारी से लिखे गये इस उपन्यास को पढने का सफर बेहद रोचक और रोमांचकारी रहा।