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कृषि विज्ञान केन्द्रों की कार्यदक्षता बढ़ाना आज की आवश्यकता: डाॅ. राठौड़

Editor-Rashmi Sharma
 जयपुर 24 अप्रैल 2021 – प्रसार शिक्षा निदेशालय, महाराणा प्रताप प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर द्वारा “कृषि विज्ञान केन्द्रों की कार्यदक्षता में वृद्धि” विषय पर तीन दिवसीय आॅनलाईन प्रशिक्षण का आज समापन हुआ। तीन दिवसीय यह प्रशिक्षण महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर तथा राष्ट्रीय कृषि विस्तार प्रबंधन संस्थान, हैदराबाद के सयुंक्त तत्वाधान में आॅनलाईन मोड में आयोजित किया गया। निदेषक, प्रसार षिक्षा एवं इस प्रशिक्षण के कोर्स डायरेक्टर डाॅ. एस.एल. मून्दड़ा ने बताया कि प्रषिक्षण का मुख्य उद्वेश्य देष में कार्यरत विभिन्न कृषि विज्ञान केन्द्रों की कार्यदक्षता में वृद्धि हेतु इससे सम्बन्धित विभिन्न पहलुओं पर देष के ख्याति प्राप्त वैज्ञानिकों के व्याख्यानों द्वारा उनके अनुभवों को साझा कराना था ताकि किसानों की आकांशाओं को पूरा करने के लिए केवीके मिशन मोड के रूप में कार्य कर उनका चहुमुखी विकास कर सके।
प्रशिक्षण के समापन सत्र के मुख्य अतिथि महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रोद्यौगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर के कुलपति डाॅ. नरेन्द्र सिंह राठौड़ तथा डाॅ. पी. चन्द्रषेखर, महानिदेषक, राष्ट्रीय कृषि विस्तार प्रबन्धन संस्थान, हैदराबाद विषिष्ट अतिथि थे। डाॅ. राठौड़ ने अपने व्याख्यान में कहा कि आज हमारे समक्ष फसलों की उत्पादकता, गुणवता, पारिश्रमिकता, टिकाऊपन एवं कृषि विपणन की अनेक चुनौतियां हैं जिन्हें सभी कृषि वैज्ञानिकों को मिलकर समाधान करना होगा। किसानों की सहभागिता के साथ अनुसंधान की प्राथमिकताओं में फसलों के उत्पादन एवं उत्पादकता बढ़ाना, मुलभूत एवं युक्ति पूर्ण अनुसंधान को बढ़ावा देना, पादप एवं पषु स्वास्थ्य प्रबन्धन, जलवायु अनुकुलन कृषि, स्मार्ट एग्रीकल्चर आधारित प्रदर्षन आदि पर विस्तृत चर्चा की। अपने उद्बोधन में डाॅ. राठौड़ ने वैज्ञानिकों को मृदा प्रषिक्षण, मृदा उर्वरता मानचित्रण, वर्षा जल संरक्षण, जल उपयोग दक्षता बढ़ाने, क्लाईमेट स्मार्ट एग्रीकल्चर, कौषल विकास, कृषि में युवाओं का ठहराव, किसान उत्पादक संगठन, डिजीटल इण्डिया, स्कील इण्डिया, स्वच्छ भारत, मेक इन इण्डिया, सटीक कृषि, द्वितीयक कृषि, वर्टिकल फार्मिंग, एरोपोनिक्स और हाईड्रोपोनिक्स जैसे नवीनतम पहलुओं एवं कार्य योजनाओं पर मिषन मोड के रूप में क्रियान्वित करने हेतु आगाह किया। समापन सत्र में डाॅ. राठौड़ ने कहा कि कृषि विज्ञान केन्द्र केवल प्रसार षिक्षा तक ही सीमित नहीं है बल्कि अनुसंधान एवं अध्यापन का कार्य भी अच्छी तरह से कर सकते है। कृषि विज्ञान केन्द्र जिला स्तर पर एक नाॅडल ऐजेंसी है जिन्हें कृषकों एवं नवयुवकों के उत्थान हेतु रोड़ मेप बनाना चाहिये ताकि उनका चहुमुखी विकास हो सके। कृषि विज्ञान केन्द्रों को विकसित तकनीकी का एक उपयुक्त दस्तावेज बनाने हेतु कहा साथ ही किसानों की आमदनी 2022 तक दूगुनी करने में कृषि विज्ञान केन्द्रों की महती भूमिका का उल्लेख किया। कृषि में मषीनीकरण पर विषेष ध्यान देने की आवष्यकता बताते हुए डाॅ. राठौड़ ने बताया कि प्रत्येक कृषि विज्ञान केन्द्र को जिले में कम से कम एक किसान उत्पादक संगठन बनाना चाहिये।
 कार्यक्रम के समापन सत्र के विषिष्ट अतिथि डाॅ. पी. चन्द्रषेखर ने कृषि विज्ञान केन्द्रों को जिला स्तरीय कृषि विष्वविद्यालय की संज्ञा देते हुए कहा कि कृषि विज्ञान केन्द्रों को जिला स्तर पर विभिन्न संस्थाओं से अच्छे सम्पर्क बनाने, आत्मा के साथ समन्वय कर ब्लाॅक स्तर पर वार्षिक कार्ययोजना बनाने और कृषि उद्यमता आधारित उद्यम पर कार्य करना चाहिये। इसके साथ ही उन्होंने किसान उत्पादक संगठन पर भी जोर देते हुए कहा कि इस तरह के संगठनों से किसानों को अपने उत्पाद का अच्छा मूल्य मिल सकेगा। कृषि विज्ञान केन्द्रों को खुर्दरा उर्वरक विक्रेता प्रषिक्षण आयोजित करने हेतु कहा ताकि ये लोग गांवों में किसानों को प्रभावी सेवाऐं दे सके। उन्होनें अपने उद्बोधन में कृषि विज्ञान केन्द्र को कृषि व्यापार केन्द्र के नाम से जाना जाये तो भी कोई अतिष्योक्ति नहीं है साथ ही कहा कि फार्मर लेड एक्टेंषन के बजाय मार्केट लेड एक्टेंषन पर विषेष ध्यान देने की जरूरत है ताकि किसानों को अपने उत्पाद का उचित मूल्य प्राप्त हो सके।
डाॅ. एस.के. सिंह, निदेषक, आई.सी.ए.आर.-अटारी, जोधपुर ने अपने व्याख्यान में प्रथम पंक्ति प्रदर्षनों के प्रभावी क्रियान्वयन के विभिन्न पहलुओं पर विस्तृत प्रकाष डाला। प्रशिक्षण में डाॅ. जी. जया, उप निदेशक, राष्ट्रीय कृषि विस्तार प्रबंधन संस्थान, हैदराबाद ने प्रतिभागियों को संचार दक्षताओं एवं टीम बिल्डिंग के महत्व के बारे में विस्तृत रूप से बताया। उन्होंने बताया कि वर्तमान में संचार के साधन बदल गये हैं तथा अब बहुत ही उन्नत और तेज साधान विकसित हो गये हंै जो कृषि विज्ञान केन्द्रों को एक साथ हजारो किसानों से जोड़ने में सक्षम है। वैज्ञानिकों को इन नवीनतम संचार माध्यमों का इस्तेमाल करना चाहिए। डाॅ. जी भास्कर, सह निदेशक, राष्ट्रीय कृषि विस्तार प्रबंधन संस्थान, हैदराबाद ने “कृषि में सूचना एवं सम्प्रेषण प्रौद्योगिकी की उपयोगिता पर अपने विचार रखे ताकि कृषि विज्ञान केन्द्र एक साथ हजारों किसानों को जोड़ सके। डाॅ. अरविन्द कुमार, प्रधान वैज्ञानिक (कृषि विस्तार), भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, अटारी, जोधपुर ने नवाचारों की ग्रहणता बढ़ाने में प्रक्षेत्र परीक्षण की संकल्पना एवं इनकी तकनीकी शोधन में अहम भूमिका पर विस्तृत रूप से व्याख्यान दिया। डाॅ. प्रभु कुमार, पूर्व निदेशक प्रसार, आई.सी.ए.आर- अटारी, लुधियाना ने तकनीकी अनुप्रयोग में प्रसार दृष्टिकोण एवं इससे जुडे़ नवीन आयामों पर प्रकाश डाला। प्रशिक्षण में डाॅ. नीलम ग्रेवाल, कुलपति, गुरू कृषि विश्वविद्यालय, पंजाब ने ग्रामीण महिलाओं के सशक्तिकरण एवं लिंग संवेदीकरण जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर प्रतिभागियों से विचार विर्मश किया। डाॅ. सुर्या राठौड़, प्रधान वैज्ञानिक, राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान एवं प्रबन्ध अकादमी, हैदराबाद ने कृषि विज्ञान केन्द्रों के वरिष्ठ वैज्ञानिकों एवं अध्यक्षों में प्रबन्ध दक्षताओं में बढ़ोतरी के सन्दर्भ में बताया कि कैसे ये वैज्ञानिक अपनी कार्यक्षमता में सुधार करते हुए अधिक दक्षता से कार्य कर सकते हैं। डाॅ. सुजीत सरकार, प्रधान वैज्ञानिक (प्रसार शिक्षा), भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, ने उन तकनीकों पर प्रकाश डाला जिनके माध्यम से विभिन्न प्रशिक्षणों एवं प्रथम पंक्ति प्रदर्शनों के प्रभाव का आंकलन किया जा सके और उनके परिणामों को सही तरीके से लिखा जा सके। प्रशिक्षण में डाॅ. रणधीर सिंह पोसवाल, उपमहानिदेशक कृषि प्रसार, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद्, नई दिल्ली, डाॅ. एम.एम. अधिकारी, पूर्व प्रसार शिक्षा निदेशक एवं पूर्व कुलपति, बी.सी.के.वी. वेस्ट बंगाल, डाॅ. एस.के. सोम, संयुक्त निदेशक, राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान एवं प्रबन्ध अकादमी, हैदराबाद, डाॅ. बी. जिरली, विभागाध्यक्ष प्रसार शिक्षा, बनारस हिन्दु विश्वविद्यालय, वाराणसी आदि प्रमुख वक्ताओं ने भी महत्वपूर्ण विषयों पर अपने विचार रखे तथा प्रतिभागियों से विचार विमर्ष किये। तीन दिवसीय प्रशिक्षण का संचालन सुश्री लतिका व्यास, प्राध्यापक, प्रसार शिक्षा निदेशालय, उदयपुर ने किया तथा बताया कि प्रशिक्षण में प्रसार षिक्षा से जुड़े देष के विभिन्न राज्यों के 211 प्रतिभागियों ने अपना पंजीयन कराया तथा मूल्यांकन भी किया गया। तीन दिवसीय प्रषिक्षण कार्यक्रम की आयोजन टीम में डाॅ. पी.सी. चपलोत, डाॅ. राजीव बैराठी, प्राध्यापक, प्रसार शिक्षा निदेशालय, उदयपुर एवं डाॅ. शुभम मिश्रा थे।