नई दिल्ली, 8 मई, 2026: भारत में मैटरनिटी हेल्थकेयर के क्षेत्र में बड़ा बदलाव आ रहा है, आज बड़ी संख्या में महिलाएं चिकित्सा संस्थानों में औपचारिक सेवाओं का लाभ उठा रहीं हैं। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक आज 88-90 फीसदी से अधिक महिलाओं की डिलीवरी (बच्चों का जन्म) चिकित्सा संस्थानों में होती है, 2023-24 में चिकित्सा संस्थान में होने वाली डिलीवरी का आंकड़ा 97.3 फीसदी पर पहुंच गया है। ये आंकड़े अस्पताल में मां की औपचारिक देखभाल की ओर बढ़ रहे झुकाव को दर्शाते हैं। 2025 में सरकार द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक 2024-25 के दौरान भारत में जन्मे बच्चों में से 27 फीसदी की डिलीवरी सी-सेक्शन से हुई। ये आंकड़े माताओं की चिकित्सकीय रूप से गहन देखभाल ओर बढ़ते रूझानों का संकेत हैं।
इस बीच केयर हेल्थ इंश्योरेन्स के अनुसार महिलाओं के हेल्थ क्लेम का पैमाना और तीव्रता दोनों बढ़ रहे हैं। वित्तीय वर्ष 25 से वित्तीय वर्ष 26 के बीच महिलाओं के हेल्थ इंश्योरेन्स क्लेम्स की संख्या बढ़कर 37 फीसदी पर पहुंच गई, इस बढ़ोतरी में सबसे ज़्यादा योगदान 20-40 वर्ष की महिलाओं का रहा, समान अवधि में इस वर्ग की संख्या में 25 फीसदी की बढ़ोतरी हुई।
साथ ही मैटरनिटी क्लेम अधिक महंगे हो रहे हैं, टियर 2 और टियर 3 शहरों से इनका योगदान बढ़ रहा है। आंकड़ों के मुताबिक कंपनी को किए गए कुल मैटरनिटी क्लेम्स में से 60 फीसदी क्लेम इन्हीं शहरों से किए गए।
मैटरनल ऐज प्रोफाइल में अंतर भी साफ नज़र आ रहा है। वित्तीय वर्ष 26 के दौरान कुल मैटरनिटी क्लेम्स में से 12 फीसदी क्लेम 35 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं द्वारा किए गए, यह आंकड़ा पिछले वर्षों की तुलना में अधिक था और लगातार बढ़ रहा है। इस आयु वर्ग में क्लेम की कुल राशि भी 18 फीसदी अधिक रही, जो ज़्यादा उम्र में गर्भावस्था के मामले में लागत बढ़ने का संकेत है।
पिछले दो सालों में मैटरनिटी क्लेम पर होने वाला खर्च 25 फीसदी बढ़ गया है, हालांकि क्लेम के वॉल्युम में उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहे हैं। वहीं हर मामले पर खर्च अधिक आ रहा है।
जहां एक ओर ज़्यादातर डिलीवरियां अस्पतालों में हो रही हैं, वहीं मैटरनल केयर के लिए पांच दिनों के भीतर डिस्चार्ज होने वाली महिलाओं की संख्या जो वित्तीय वर्ष 24 में 75 फीसदी थी, वह वित्तीय वर्ष 26 में बढ़कर 82 फीसदी पर पहुंच गई है। अस्पताल से छुट्टी मिलने की अवधि में होने वाले इस अंतर से लागत में कोई कमी नहीं आई, इसके बजाए मैटरनल उपचार में कंपनी का खर्च लगातार बढ़ा है।
ये सभी रूझान मैटरनल हेल्थकेयर में आ रहे बदलावों का संकेत हैं, जहां बढ़ती लागत और देखभाल के बदलते तरीके वित्तीय जोखिम को बढ़ा रहे हैं। सार्वजनिक स्वास्थ्य के आंकड़े इन निष्कर्षों को और अधिक बल प्रदान करते हैं, जिनके मुताबिक भारत में ज़्यादातर महिलाओं को डिलीवरी से पहले औपचारिक देखभाल मिल रही है, हालांकि हर चार में से तीन महिलाओं के आहार में आयरन की कमी है। ये आंकड़े मैटरनिटी सेवाओं के दायरे से बढ़कर पोषण की खामियों और लम्बे समय के लिए स्वास्थ्य संबंधी जोखिमों की ओर इशारा करते हैं।
इन परिणामों पर बात करते हुए मनीष डोडेजा, एक्ज़क्टिव डायरेक्टर एवं चीफ़ बिज़नेस ऑफिसर, केयर हेल्थ इंश्योरेन्स ने कहा, ‘‘महिलाओं के हेल्थके इंश्योरेन्स क्लेम स्केल और इंटेसिटी दोनों नज़रियों से बढ़ रहे हैं। मैटरनिटी हेल्थकेयर में हमें स्पष्ट बदलाव देखने को मिल रहा है, लागत भी बढ़ रही है। हालांकि देखभाल ज़यादा प्रभावी हो गई है, वहीं मैटरनल हेल्थकेयर में होने वाला खर्च भी बढ़ रहा है। यह सिर्फ एक चलन नहीं बल्कि इस बात का संकेत है कि कैसे महिलाएं स्वास्थ्यसेवाओं तक पहुंच बना रहीं हैं। इसलिए लोगों के लिए यह महत्वपूर्ण है कि वे समय-समय पर अपने कवरेज का मूल्यांकन करते रहें और सुनिश्चित करें कि यह आज के दौर में बदलती ज़रूरतों के अनुरूप बना रहे।’’
मैटरनल हेल्थकेयर लगातार औपचारिक रूप से ले रहा है, इनका उपयोग बढ़ रहा है। ऐसे में समय रहते उचित हेल्थ इंश्योरेन्स कवरेज का सुनिश्चित करना ज़रूरी है ताकि ज़रूरत पड़ने पर आवश्यक देखभाल मिल सके और वित्तीय जोखिम को नियन्त्रण में रखा जा सके।
पत्रिका जगत Positive Journalism